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सम्प्राप्ति

सम्प्राप्ति
रोग का ज्ञान निदान, पूर्वरूप आदि से सामान्य रूप से होता है। रोग का सम्यक् ज्ञान सम्प्राप्ति ज्ञान के बिना
संभव नहीं क्योंकि दोष दूष्य की विकृत स्थिति को सम्प्राप्ति द्वारा ही जाना जा सकता है।
परिभाषा
   यथादुष्टेन दोषेण यथाचानुविसर्पता।
 निवृत्तिरामयस्यासौ संप्राप्तिर्जातिरागतिः। (अ. ह. नि. 1/8)
दोष जिस प्रकार (प्राकृत आदि विविध) निदानों से दूषित होकर और जिस प्रकार (उर्ध्व, अधो, त्रियक गतियों
के द्वारा शरीर में) विसर्पण करते हुये धातु आदि को दूषितकर रोग को उत्पन्न करता है उसे सम्प्राप्ति कहते हैं।
या रोगों की सम्यक् प्राप्ति ही सम्प्राप्ति है।- चक्रपाणिटीका के अनुसार           व्याधिजनकदोषव्यापारविशेषयुक्तं व्याधिजन्मेह संप्राप्तिशब्देन वाच्यम्।                                     अतएवपर्याये 'आगतिः' इति उक्तम्। (च. नि. 1/11 पर चक्रपाणि टीका)
व्याधिजनक दोषों के विविध व्यापारों एवम् परिणामों से युक्त व्याधिजन्म ही सम्प्राप्ति है। अर्थात् निदान सेवन
से लेकर दोषदुष्टि होना उसके बाद लक्षणोत्पत्ति के बाद सम्पूर्ण व्यापार परम्परा को ही सम्प्राप्ति कहा जाता है।दोषेतिकर्तव्यतोपलक्षितं व्याधिजन्मेह संप्राप्तिः न तु केवलं जन्म (मधुकोश टीका)
रोगोत्पादक दोष की रोगोत्पत्ति में जो इति कर्तव्यता होती है उसी का नाम सम्प्राप्ति है यहाँ केवल व्याधि जन्म मात्र का ही ग्रहण नहीं करते अपितु रोगारम्भक दोष किस प्रकार दुष्ट हुआ है, तदनन्तर शरीर में उसके अनुधावन का क्या स्वरूप है इसका विवरण सम्प्राप्ति कहलाता है।
हेमाद्रि --ने रोगोत्पादक दोष की दुष्टि के निम्न प्रकार बताये।
(1) दोष दुष्ट होना - दोषों के रूपों में वृद्धि अथवा हानि होना।
(2) दोषों का चलित होना - दोषों का अपने स्थान से च्युत होना अथवा प्रकृत मार्ग छोडकर मार्गान्तर में
गति करना।
सम्प्राप्ति के पर्याय- जाति, आगति
1. जाति- जती प्रादुर्भावे धातु से जाति शब्द बना है।
जाति सम्प्राप्ति का पयार्यवाची शब्द है जिसका अर्थ है कि व्याधि का जन्म होना।
2. आगति - उत्पादक कारणों द्वारा व्याधि जन्म तक की प्रक्रिया को आगति कहते हैं।
आगतिर्हि उत्पादकारणस्य व्याधिजननपर्यन्तं गमनम्। चक्रपाणि च. नि. 1/10
      आगति भी सम्प्राप्ति का पयय्र्वाचिओ है जिसका अर्थ है कि व्याधि के जन्म का करन जो व्यधि होने के बाद भी नही रुकता है।
सम्प्राप्ति के भेद -- आचार्य वाग्भट्ट के अनुसार सम्प्राप्ति के 5 भेद बातये गये।संख्याविकल्पप्राधान्यबलकालविशेषतः। (अ. ह. नि. 1/9)
1. संख्या सम्प्राप्ति
2. विकल्प सम्प्राप्ति
3. प्राधान्य सम्प्राप्ति
4. बल सम्प्राप्ति
5. काल सम्प्राप्ति
आचार्य चरक ने ज्वरनिदानाध्याय में सम्प्राप्ति के 6 भेद बताते हुये विधि सम्प्राप्ति का अतिरिक्त वर्णन किया।
1. संख्या सम्प्राप्ति-                                                                                                              संख्या तावद्यथा- अष्टौ ज्वराः, पञ्चगुल्माः, सप्त कुष्ठान्ये वमादिः। (च. नि. 1/12)
संख्या सम्प्राप्ति द्वारा रोगों के भेदों की गणना की जाती है! यथा- ज्वर के आठ प्रकार , गुल्म पाँच प्रकार का
कुष्ठ सात प्रकार का इत्यादि।
रोगों के भेदों के अनेक आधार है जिन्में से प्रमुख का वर्णन किया जा रहा है।
1. दोषानुसार ज्वर के आठ भेद
1. वातज, 2. पित्तज, 3. कफज, 4. वातपित्तज, 5. वातकफज, 6. पित्तकफज, 7. सन्निपातज, 8. आगन्तुज
2. दूष्यों के आधार - दूष्यों के आधार पर भी व्याधियों के भेद किये गये हैं।
विषम ज्वर के 5 भेद (मधुकोश टीकानुसार दूष्यों के वर्णन)
     1. संतत ज्वर - रस धातु आश्रित                  
     2. सतत ज्वर – रक्तधातु आश्रित
     3. अन्येदुष्क ज्वर - पिशिताश्रित              
     4. तृतीयक ज्वर - मेद आश्रित
     5. चतुर्थक ज्वर - अस्थिमज्जाश्रित
3. स्रोतसों के आधार पर रोगों के भेद  
1. आमाशयगत विष
2.पक्वाशयगतविष
4. दोषों की गति के आधार पर रोगों के भेद
कामला के 2 भेद -
1. शाखाश्रित कामला,
2. कोष्ठाश्रित कामला
रक्तपित्त के 3 भेद - 
1. अधोगतरक्तपित्त
2. उर्ध्वगतरक्तपित्त
3. उभयगत रक्तपित्त
आदि अनेक संख्याओं के आधार पर व्याधियों के भेद जाने जाते हैं।
2. विकल्प सम्प्राप्ति-
दोषाणां समवेतानां विकल्पोऽशांश कल्पना। (अ. ह. नि. 1/10)
समवेतानां पुनर्दोषाणामंशांशबल विकल्पोऽस्मिन्नर्थे । (च. नि. 1/194)
व्याधि से सम्बद्ध दोषों की अशांश कल्पना को विकल्प सम्प्राप्ति कहते हैं। चरक के अनुसार  दोषों के अधिक अंशों अथवा अल्प अंशों के द्वारा उत्पन्न व्याधि की सम्प्राप्ति को विकल्प सम्प्राप्ति जाना जाता है।
वात के रुक्षित गुणों को अन्शा कहते है इस गुण के समूह मे एक, दो, तीन या समस्त अंशों से वात आदि के  प्रकोप का निश्चय करना ही अंशाश कल्पना कहलाता है।
            वात में रुक्षता, शीतता, लघुता, खरता, चलत्तवा गुण है।
(1) कलाय वात के सम्पूर्ण अंशों को प्रकुपित करता है।
(2) तण्डुलीयक (चौलाई)- रुक्षता, शीतता, लघुता इन तीन गुणों से वात को केवल तीन अंशों से प्रकुपित
करता है।
(3) ईक्षुकाण्ड - इसमें रूक्षता तथा शीतता दो गुण होते हैं अत: यह शरीर में वात के दो अंशों को ही कुपित
करता है।
पित्त उष्ण,
(4) सीधू - इसमें रुक्षता ही एक मात्र गुण है यह बात को एक अंश से ही कुपित करता है। तीक्ष्ण, स्नेह, द्रव, अम्ल, सर, कटु आदि गुण होते हैं।
           पित्त में कटु, तीक्ष्ण, उष्ण  गुण है।
1. मद्य व कटुरस- पित के समस्त गुण विद्यमान है अत: यह पित्त का सर्वाश में प्रकोप करता है।
2. हिंगु - कटु, तीक्ष्ण, उष्ण तीन गुण होते है अत: यह शरीर में पित्त के तीन अंशों को ही कुपित करता है।
3. यवानी - तीक्ष्ण व उष्ण दो गुण होते है यह पित्त को दो अंशों को ही कुपित करता है।
4. तिल - केवल उष्णता गुण होने के कारण पित्त को एक अंश से ही कुपित करता है।
          कफ में गुरु, शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर, पिच्छिल गुण है।
1. माहिष दुग्ध, मधुर रस में कफ के समस्त गुण विद्यमान होते हैं अत: यह कफ का सर्वांश प्रकोप करते हैं।
2. राजादन फल- स्निग्ध, गौरव, माधुर्य इन तीनों गुणों से कफ के तीनों अंशों को कुपित करता है।
3. कशेरु में शैत्य और गौरव दो गुण होते हैं अतः कफ को दो अंशों में कुपित करते है।
4. क्षीरी वृक्षों के फल केवल शैत्य गुण के कारण एक अंश में ही कफ को कुपित करते है।
3. प्राधान्य सम्प्राप्ति-
   प्राधान्यं पुनर्दोषाणां तरतमाभ्यामुपलभ्यते तत्र द्वयोतरस्त्रिषु तम इति। (च. नि. 1/10/2)
   स्वातन्त्र्य पारतन्त्राभ्यां व्याधेः प्राधान्यमादिशेत्। (अ. ह. नि. 1/10)
                     व्याधि से सम्बन्धित दोषों की स्वतन्त्रता एवम् परतन्त्रता के आधार पर व्याधि की प्राधान्य व अप्राधान्य सम्प्राप्ति का निर्देश करना चाहिये। रोगोत्पादक मुख्य दोषों की स्वतन्त्रता का जिसके द्वारा ज्ञान हो उसे उस रोग की प्राधान्य सम्प्राप्ति और जिसके द्वारा गौण दोषों की परतन्त्रता का ज्ञान हो उसे उस रोग की अप्राधान्य सम्प्राप्ति कहते है। प्राधान्य कहने पर अप्राधान्य का ज्ञान स्वत: हो जाता है। द्वन्द्वज में दो दोष और त्रिदोष में तीन दोष मिले होते है। उनमें से एक दोष रोग को उत्पन्न करने में स्वतन्त्र (प्रधान) होता है और अन्य दोष रोगोत्पादकता में गौण होने पर परतन्त्र होते है। चिकित्सा सूत्र का निर्धारण मुख्यतः प्राधान्य सम्प्राप्ति के अनुसार किया जाता है अर्थात् प्रधान दोष की चिकित्सा की जाती है व अप्रधान दोष की वृद्धि नहीं होने दी जाती है। आचार्य चरक ने रोगोत्पादक दोषों को प्रधानता व अप्रधानता के आधार पर तर तथा तम नाम से सम्बोधन किया है। वात यदि सर्वाधिक अंशों से कुपित है तो उसे वृद्धतम कहा जाता है। पित्त अपेक्षाकृत वात से कुछ कम अंशों में प्रकुपित हो तो वृद्धतर कहा जाता है तथा कफ सबसे कम अंशों में कुपित है तो उसे वृद्ध ही सम्बोधन किया जाता है। दोषों की दुष्टि एक, द्वि अथवा त्रिदोषों से अथवा, साम निराम प्रकार से अथवा प्राकृत, वैकृत अथवा अनुबन्ध्य, अनुबन्ध रूप से अनेक प्रकार की होती है। इसी प्रकार दोष सामान्य प्रमाण में रहते हुये अथवा विकृत प्रमाण में रहते हुये कभी उर्ध्व, अधः अथवा तिर्यक गति करते है कभीशाखा, मर्मास्थि, सन्धि भेद से दोषों की गति विविध प्रकार की होती है।
                      इस प्रकार कभी दोष दुष्टि रूप में अथवा दुष्ट गति करते हुये, किसी स्रोतस में रुककर, धातु और मलों को दूषित करके रोगोत्पत्ति उत्पन्न करते है इस प्रकार दुष्टि से लेकर रोगोत्पत्ति पर्यन्त समस्त व्यापार सम्प्राप्ति कहा जाता है। ज्वर की उत्पत्ति का उदाहरण प्रस्तुत करते हुये कहा है कि-
 यदा प्रकुपितः प्रविश्यामाशयमूष्मणा सह मिश्रीभूयाद्यमाहारपरिणामधातुं रसनामानमन्ववेत्य स्सस्वेदवहानि स्रोतांसि पिधायाग्निमुप्हत्य पक्तिस्थानादूष्माणं बहिर्निरस्य प्रपीडयन् केवलं शरीरमनुप्रपद्यते,
तदा ज्वरमभिनिवर्तयति। (च. नि. 1/26)
1. स यदा प्रकुपित- वात अथवा पित्त अथवा कफ प्रकोपक आहार विहार सेवन से दोष दुष्ट होते है।
2. प्रविश्य आमाशय- कुपित हुये दोष आमाशय में प्रवेश कर (संचालित रूप में दुष्ट होकर स्रोतस में रुक
जाते हैं)
3. उष्मणा सह मिश्रीभूयाद्यआहार परिणामधातु- कुपित हुये दोष आमाश्यस्थ अग्नि को दूषित करते है
जिससे वहा उत्पन्न होने वाला आद्य रस धातु भी दूषित होना प्रारम्भ हो जाता है-
4. पंक्तिस्थानदूष्माणंबहिर्निरस्य केवलं शरीरमनुप्रपद्यते- अग्नि पक्ति स्थान से बाहर निकलकर सम्पूर्ण शरीर में फैल जाती है।
5. रसस्वेदवहस्रोतांसि प्राप्त - दोष आद्य रस धातु के साथ मिलकर रस व स्वेदवह स्रोतसों के मार्ग को
अवरोधित कर देती हैं। जिससे स्वेद प्रवृत्ति नहीं हो पाती है। सम्पूर्ण शरीर में फैली हुई अग्नि से उत्पन्न संताप
स्वेदवहस्रोतस में अवरोध से बाहर नहीं निकल पाता है।
6. अग्निमांद्य के कारण ज्वर की चिकित्सा में सर्वप्रथम लंघन और पांचन करना आवश्यक हैं।
7. स्वेदवहस्रोतस में अवरोध होने से शरीर की उष्णता बाहर न निकलकर सम्पूर्ण देह में फैलती है तब स्वेदवह स्रोतस के अवरोध को दूर करने के लिये निवात स्थान में वस्त्र ढककर, शयन, उष्ण जलपान, स्वेदोपग द्रव्यों
(द्राक्षा) का प्रयोग करने से स्वेद प्रवृत्ति होकर ज्वर संताप कम होता है।
          इसी क्रम में जानकर ही चिकित्सा का निर्धारण करते है। आचार्य योगरत्नाकरज्वर के चिकित्साक्रम को इस प्रकार उघृत किया।
ज्वरादौ लंघनं कुर्यात् ज्वर मध्ये तुपाचनम्। ज्वरान्तेशमनं कुर्यात् ज्वरमोक्षे विरेचनम्। (योगरत्नाकर)
           प्रारम्भ में अग्निमांद्य होने के कारण लंघन करना चाहिये, अग्नि दीप्त होने पर पाचन द्रव्य द्वारा आम रस धातु को निराम धातु में परिवर्तित करना चाहिये, ज्वरान्त होते होते अग्नि दीप्त हो जाने पर ही शमन औषधि को प्रयोग करना चाहिये, जिससे औषध सम्यक् रूप से पक्व होकर ज्वर को शान्त करे। ज्वर के अन्त में उष्णगुणकारक पित्त का विरेचन कर शोधन किया जाता है। रोगोत्पत्ति की इस प्रक्रिया को ही दोष-दूष्य सम्मूर्च्छना कहते है।  जिसमें निम्न व्यापार परम्परा का ज्ञान आवश्यक है।
4. बल सम्प्राप्ति-   
बलकालविशेषः पुनर्व्याधिनामृत्वहोरात्राहार कालविधि नियततः भवति।
                                                                                (च. नि. 1/10/5)
      हेत्वादि काावयवैर्बलाबल विशेषणम्। (अ. ह. नि. 1/10)
              निदान, पूर्वरूप एवम् रूप के आधिक्य अथवा अल्पता के कारण व्याधि के बलाबल का ज्ञान जिससे होता है उसे बल सम्प्राप्ति कहते हैं। जैसे निदान, पूर्वरूप, रूप जितने अधिक प्रकट होते हैं व्याधि का बल उतना ही अधिक होता है और उसे सबल व्याधि जानना चाहिये। इसके विपरीत निदान, पूर्वरूप, रूप का कम प्रकट होने पर व्याधि का बल उतना ही कम होता है उसे निर्बल व्याधि जानना चाहिये। जिस व्याधि में निदान पूर्वरूपादि बहुत कम न हो अर्थात् मध्यम रूप में हो तब उसे मध्यमबल वाली व्याधि जानना चाहिये।
                 सबल व्याधि की चिकित्सा पूर्ण सावधानी से शीघ्र प्रारम्भ कर देनी चाहिये।
5. काल सम्प्राप्ति-
                जिसमें रात्रि, दिन, ऋतु एवं भोजन के आदि, मध्य और अन्त के अनुसार दोष विशेष का निश्चय किया जाता है उसे काल सम्प्राप्ति कहते हैं।
                रात्रि, दिन, ऋतु तथा भोजन के आदि में कफ, मध्य में पित्त तथा अन्त में वात का प्रकोप होता है एवं उस काल में उस दोष विशेष से सम्बन्धित रोग की उत्पत्ति होती है।
कफज व्याधियों की उत्पत्ति या वृद्धि प्रात:काल, रात्रि के आरम्भ या भोजन के तुरन्त बाद होती है।
पित्तज व्याधियों की उत्पत्ति यो वृद्धि मध्याह्न काल, मध्यरात्रि या भोजन के मध्य में होती है।
वातिक व्याधियों की उत्पत्ति या वृद्धि सांयकाल, रात्रि के अन्त या भोजन पूर्ण पच जाने पर होती है।
बसन्त, शरद, तथा वर्षा ऋतु में क्रमशः कफ, पित्त, वात दोष का प्रकोप या इनके रोगों की उत्पत्ति होती है।
आचार्य चरक ने एक अतिरिक्त संप्राप्ति भेद का वर्णन किया।

6.विधि सम्प्राप्ति- 
पण्डित गंगाधर कविराज के अनुसार-
           अत्रविधिस्तु प्रकारः, संख्या तुभेदमात्रम् सजातीयविजातीयेषु पञ्च ब्राह्मणक्षत्रिया: प्रकारस्तु सजातीयेषु
भिन्नेषु धर्मान्तरेण उपपत्ति। (च.नि.1/2 गंगाधर टीका)
           विधि शब्द का अर्थ प्रकार है उसका प्रयोग भिन्न जाति के व्यक्तियों में नहीं किया जा सकता है यथा गोत्व
गौ में ही रह सकता है। अश्व में नहीं। किन्तु गौ भी अनेक प्रकार की होती है और उनका भेद किसी विशेष धर्म के
आधार पर करना होगा तो उसे विधि कहेंगे। तात्पर्य यह है कि संख्या आदि के द्वारा रोगों का भेद कर देने पर भी
चिकित्सोपयोगी धर्मभेद के प्रतिपादनार्थ विधि का कथन अवश्य करना चाहिये।
          शास्त्र में विधि शब्द के प्रयोग तथा संख्या शब्द के प्रयोग के अनेक उदाहरण उपलब्ध है। इन दोनों के उचित अर्थक्षेत्र की मर्यादा का ज्ञान करना परमावश्यक है। इसका निरुपण वाप्यचन्द्र ने किया कि विधि और संख्या में भेद केवल इतना है कि विधि का अर्थ प्रकार है और उसका प्रयोग एक ही जाति के अन्तर्गत दो या दो से अधिक व्यक्तियों में भेद प्रदर्शित करने के लिये किया जाता है। यथा त्रिविधं रक्तपित्तम-तिर्यगूर्वाधोगभेदात्। यथा तिर्यग्, उर्ध्वग और अधोग में रक्तपित्त जाति समान होने के कारण विधि भेद कहते है।
           जबकि संख्या का प्रयोग धर्म निरपेक्ष व्यक्ति भेद की गणना मात्र है। अर्थात् पृथक् वस्तुओं की गणना, बिना किसी विशिष्ट धर्म के विचार किये रोगों का भेद करना संख्या सम्प्राप्ति है। संख्या का प्रयोग सर्वत्र किया जा सकता है।
 यथा चत्वारो घटाः, अष्टौज्वरा, पञ्चगुल्माः, सप्तकुष्ठानि। (च.नि.1/11(2))

सम्प्राप्ति घटक:-
                 निदान पंचक में सम्प्राप्ति की उपयोगिता चिकित्सा निर्धारण में ही है। सम्प्राप्ति के विभिन्न भेद जैसे अंशाश, विकल्पना, बल, काल आदि को जाने बिना चिकित्सा करना सम्भव नहीं है।
                 सम्प्राप्ति को आगति इसलिये कहा जाता है क्योंकि निदान सेवन से लेकर दोषों का दुष्ट होना तत्पश्चात् दूष्यों को दुष्ट कर दोष दूष्य सम्मूर्च्छना उत्पन्न करना, तत्पश्चात् उत्तरकाल में व्याधि की उत्पत्ति होती है।
                अतः निदान सेवन से लेकर व्याधि उत्पत्ति तक का व्यापार सम्प्राप्ति कहलाता है।
                इस व्यापार के विभिन्न चरण होते है तथा प्रत्येक चरण में अलग-अलग घटकों की भूमिका होती है जो कि रोग का ज्ञान कराने व रोग की चिकित्सा निर्धारण करने में उपयोगी होती है।
व्याधिजनक दोष व्यापार विशेष युक्तं व्याधिजन्म सम्प्राप्ति। (च.नि. 1/11 चक्रपाणि टीका)
                     सम्प्राप्ति घटकों के विघटन को ही चिकित्सा कहा जाता हैं।
1. सम्प्राप्ति का प्रथम व्यापार निदान सेवन दोष - विभिन्न दोष प्रकोपक आहार विहार के सेवन से रोग उत्पत्ति की प्रथम प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। प्रकुपित हुये दोषों का ज्ञान निदान सेवन से होता है।
2. सम्प्राप्ति व्यापार का द्वितीय घटक दूष्य - यह रोगोत्पत्ति का दूसरा महत्वपूर्ण घटक होता है।
दोष, प्रकृति समसमवेत रुप से दुष्टि द्वारा उत्पन्न कर समान गुणधर्मों वाले दूष्यों को प्रभावित करते हैं।
दोष, विकृति विषमसमवेत रूप से दुष्ट होकर अपने गुण के विपरीत दूष्यों को प्रभावित करते है।
3. रोगोत्पत्ति व्यापार का तृतीय घटक- अधिष्ठानयह रोगानुसार शरीर अथवा मानस अधिष्ठान हो सकता है। दोषों का मूल स्थान कोष्ठ ही होता है जहाँ वह दुष्ट होकर लक्षणों में वृद्धि अथवा क्षय करते है तथा यही से दोष चलित होते हैं।
4. रोगोत्यत्ति व्यापार का चतुर्थ घटक- स्रोतस- दोष प्रधान अधिष्ठान से चलित होकर जिस स्रोतस में वैगुण्य होता है, वहां रुक कर धातुओं को दूषित करते है जिससे दोष दूष्य सम्मूर्च्छना द्वारा स्रोतो दुष्टि के लक्षण दिखाई देते हैं। अत: यह रोगोत्पत्ति व्यापार का चतुर्थ घटक होता है।
5. रोगोत्पत्ति व्यापार का पंचम घटक- स्रोतोदुष्टि- स्रोतसों में दुष्टि के चार भेद का वर्णन आचार्य चरक ने किया है।
  अतिप्रवृत्तिः सङ्गो वा सिराणां ग्रन्थयोऽपि वा।
 विमार्गगमनं चापि स्रोतसां दुष्टिलक्षणम्।। (च. वि. 5/24)
स्रोतसों के दुष्ट होने से धातु अथवा मलों की अतिप्रवृति अथवा धातु व मलों का संग हो जाता है अथवा
स्रोतसों से निकलने वाली सिराओं में दोष दूष्य दुष्टि के कारण ग्रन्थि निर्माण होता है। अथवा कभी-कभी दोष स्रोतसों से निकल कर अन्य स्रोतसों में गमन कर आये अथवा विमार्गगमनं को प्राप्त होकर अन्य विकृति को उत्पन्न करे यह सभी रोगोत्पत्ति के महत्वपूर्ण घटक है। क्योंकि इसी के आधार पर चिकित्सा का निर्धारण किया जाता है।
6. रोगोत्पत्ति व्यापार का छठा घटक-अग्नि दुष्टि- दोषों के अनुसार शरीर की 13 प्रकार की अग्नि कभी तीक्ष्णता को प्राप्त होती है कभी मन्दता व कभी विषम होने के कारण रोग उत्पन्न करती है। इसी आधार पर दीपन पाचन द्रव्यों का निर्धारण किया जाता है।
7. अवस्था उपद्रव-
दोषों की आम निराम अवस्था, दोष दूष्य की प्रबलता से आशुकारी व चिरकारी व्याधि अवस्था, अवस्था सम्प्राप्ति घटक का ही अंश है।
              साम/निराम
                   आशुकारी/चिरकारी
उपद्रवावस्था- इसके द्वारा भी चिकित्सा का निर्धारण किया जाता है जैसे साम निरामावस्था में अग्नि को ध्यान में रखना है। आशुकारी व चिरकारी में दोष दूष्य सम्मूर्च्छना के बल का विचार करना चाहिये तथा उपद्रव अवस्था में प्रधान व्याधि की चिकित्सा करनी चाहिये।
8. साध्यसाध्यता - अंततः परन्तु सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटक व्याधि की साध्य व साध्यता का विचार करना
है क्योंकि साध्य लक्षण होने पर ही चिकित्सा की जायेगी अन्यथा चिकित्सा योग्य व्याधि नहीं होने पर रोगी की
चिकित्सा नहीं की जायेगी।

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